मेरी शिक्षकीय यात्रा
मेरी शिक्षकीय यात्रा
काफी संघर्ष और मेहनत के बाद जीवन में आज वह दिन आ ही गया जिसका काफी समय से इंतजार था।
30.8.2016 को प्राथमिक विद्यालय हीरागंज में मेरी प्रथम नियुक्ति हुई।जहांँ मात्र दो शिक्षक का स्टॉफ था।मुझे लेकर विद्यालय में तीन शिक्षक का स्टॉफ हो गया। जो शिक्षा का स्तर बेहतर करने के लिए काफी था। कार्यभार ग्रहण के बाद मन में एक उत्साह था कुछ करने का कुछ बदलाव लाने का लेकिन जब हम जिस जगह पर रहते हैं तब हम वहांँ की वास्तविकता से रूबरू होते हैं। कुछ ही दिनों में यह अच्छे से पता चल गया कि विद्यालय तो बस समय व्यतीत करने और पैसा कमाने का बस एक जरिया बना है। जिस काम के लिए अध्यापक यहांँ नियुक्त हुए हैं वह तो हो ही नहीं रहा। कोई सिस्टम कोई व्यवस्था कोई अनुशासन नहीं। बेजान नीरस बस ईट की इमारत। बच्चों के पानी पीने तक की कोई व्यवस्था नहीं। चारों तरफ सिर्फ गंदगी ही गंदगी।विद्यालय में कुछ है तो सिर्फ तानाशाही। विद्यालय के बच्चे हर समय घूमते, खेलते, लड़ाई करते। पढ़ाई से तो दूर - दूर तक कोई वास्ता ही नहीं। विद्यालय का ऐसा वातावरण जो यह महसूस ही न होने दे कि मैं एक शिक्षिका हूंँ।
विद्यालय में तीन शिक्षक जो आपस में समन्वय स्थापित कर शिक्षा के स्तर को और अधिक बेहतर बना सकते थे। पर यहांँ तो शिक्षा से हटकर बाकी सारे काम हो रहे थें।
जब मैं बच्चों को पूरी मेहनत और लगन के साथ पढ़ाती तो स्टॉफ के बाकी शिक्षक यह कहते नई-नई आई हैं कुछ दिन में पढ़ाने का सारा भूत उतर जाएगा। विद्यालय के उन शिक्षकों को देखकर मुझे बस इस बात की चिंता होती क्या मैं भी इन लोगों के जैसे ही हो जाऊंँगी?
पर मेरा जमीर मुझे इस बात कि इजाजत नहीं देता कि मैं इन बच्चों के साथ किसी तरह की नाइंसाफी करूंँ। मैंने खुद से वादा किया मैं इन बच्चों के लिए इनके जीवन को और बेहतर करने के लिए हर संभव प्रयास करूंँगी। मैं अधिक से अधिक इनके लिए जो कर सकती हूंँ वह करुँगी। विद्यालय में प्रधानाध्यापिका की तरफ से तो बच्चों को पढ़ाने के लिए चॉक तक भी ना मिलती थी।
एक चॉक अगर खत्म हो जाए तो यह सुनने को मिलता की तुम बोर्ड में बहुत लिखती हो, बहुत जल्दी चॉक खत्म करती हो इतने दिन चलाया करो। जहां पढ़ाने के लिए चॉक तक ना मिल रही हो, तो वहा बाकी चीज की उम्मीद करना तो बेकार ही था। यह सब सुनकर मन बड़ा उदास हो जाता था। विद्यालय के बच्चे भी कम न थे वह भी मेरी एक भी बात सुनने को तैयार न थे। इसमें उनकी भी क्या गलती। जब बच्चों को कभी किसी तरीके का कोई अनुशासन सिखाया ही ना गया हो तो बच्चे कहांँ कुछ सुनने वाले।
बच्चे भी तो बड़ों को देखकर ही सीखते हैं। और जब शिक्षक में ही किसी तरह का कोई अनुशासन नहीं, तो फिर बच्चो में कल्पना भी कैसे की जा सकती है।
बस यही माहौल बदलना मेरे लिए चैलेंज था।
सबसे पहले मैंने बच्चों के साथ अपना मेल-जोल बढ़ाया।
उनके साथ बातें करना खेलना कई तरीके की गतिविधि कराना। ताकि बच्चे मेरी बात सुनें-समझे और अनुशासित हो। हालांकि मेरा ऐसा करना विद्यालय के किसी भी शिक्षक को पसंद ना था। रोज ही कई तरह की बातें सुनने को मिलती रोज एक नई समस्या सामने रहती।
पर कहते हैं ना जहांँ चाह वहांँ राह।
जब जीवन में कुछ करने को तय कर ही लिया तो फिर कितनी ही मुश्किलें क्यों ना आए रास्ते खुद बा खुद बनते चले जाते हैं। मुझे कुछ-कुछ समझ में आ रहा था कि विद्यालय के बाकी शिक्षक को मेरे काम से ज्यादा चिंता इस बात की थी कि कहीं कोई अधिकारी निरीक्षण पर आया तो फिर हम सब का क्या होगा। शायद इसी डर से वे ना तो खुद कुछ करना चाहते थे और ना ही दूसरों को ऐसा करते देख सकते थे। लंबे समय बाद ही सही पर मैं कुछ हद तक परिवर्तन करने में सफल रही। नल को ठीक कराने के लिए कई बार एप्लीकेशन दिया। बहुत समय बाद लेकिन नल भी ठीक हुआ। और आज विद्यालय में बाउंँड्री और शौचालय आदि भी बनकर तैयार है।
मैंने औरों को देखकर अपने इरादे नहीं बदले बल्कि अपनी मेहनत लगन और जुनून से माहौल को बदल दिया।
"लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हर नहीं होती"।
बस इन्हीं पंक्तियों को चरितार्थ करते हुए मैंने कार्य किया। आज विद्यालय में पढ़ाई का पूर्ण वातावरण है।
विद्यालय में अनुशासन है। विद्यालय में TLM से भरी एक बहुत ही सुन्दर क्लास है। आज बच्चे लंच में भी पढ़ने के लिए उत्सुक रहते हैं। मेरे कहने पर भी खेलने के लिए बहुत ही कम जाते हैं और खेलना भी है तो बस मेरे साथ।😊विद्यालय में पानी की व्यवस्था है बाउंँड्री, शौचालय आदि की व्यवस्था है। आज बच्चे पूरे मन के साथ विद्यालय में उपस्थित होते हैं मन लगाकर पढ़ाई करते हैं यहांँ तक की बच्चे छुट्टी में भी घर जाने का मन नहीं करते बोलते हैं मैडम जी थोड़ी देर और रुक जाते हैं। आज मैं गर्व के साथ कह सकती हूंँ कि मैंने अपने विद्यालय को आनंद घर बनाया है। जहां न सिर्फ बच्चे मैं स्वयं भी आनंदित रहती हूं। जिस विद्यालय को कोई जानता नहीं था कि प्राथमिक विद्यालय हीरागंज नाम का कोई विद्यालय भी है। आज उस विद्यालय को ब्लॉक यहांँ तक की जनपद में भी जाना जाता है।
मेरे द्वारा विद्यालय में नवीन विचार व नवाचार का प्रयोग करके बेहतर शिक्षण के लिए BEO मैम द्वारा BRC पर मुझे प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।
शैक्षिक संवाद मंच उत्तर प्रदेश विद्यालय बने आनंद घर चित्रकूट शिक्षक सम्मान समारोह में सम्मानित किया गया।
जिला स्तरीय योग प्रतियोगिता में डायट प्राचार्य द्वारा सम्मानित किया गया।
पंचम राज्य स्तरीय योग प्रतियोगिता में बेसिक शिक्षा मंत्री द्वारा सम्मानित किया गया।
जिंदगी की असली उड़ान अभी बाकी है ,
जिंदगी के कई इम्तिहान अभी बाकी है।
अभी तो नापी है मुट्ठी भर जमीन हमने ,
अभी तो सारा आसमान बाकी है।🙏