मेरा कमरा मेरा जीवन

जीवन में हर व्यक्ति को किसी न किसी चीज से इतना अधिक लगाव होता है कि उसकी यादें जीवन भर साथ रहती है। और समय-समय पर वह यादें मन को प्रफुल्लित करती हैं।
ऐसा ही मेरे दिल के करीब मेरा कमरा जहांँ मैंने अपने जीवन का अधिक से अधिक समय गुजारा।
मुझे आज भी याद है वह छोटा सा स्टडीरूम जिसे मैंने अपने हाथों से सजाया,संवारा और घर मे रखी हर एक किताब को उसी कमरे में रखा। उन किताबों को अगर किसी को पढ़ाना है तो उसे उस कमरे में जाना ही पड़ता था। हालांकि बाबा के घुटनो में दर्द होने के कारण उन्हें छत पर बने इस कमरे में जाने में थोड़ा दिक्कत होती थी। इसकी वजह से मुझे काफी डांँट भी पडती थी। किताबें रखना ही था तो सिर्फ अपनी ही किताबें रखती मेरी भी किताबें वहीं पर रख दिया। मैं भी बोलती बाबा, पर किताबों से भरा वह कमरा कितना अच्छा लगता है ना और वहांँ पढ़ना भी। परेशान ना हो बाबा आप की थोड़ी सी कसरत हो जाएगी। पढ़ाई के लिए बनाया गया वह कमरा जहांँ पूरी आलमारी किताबों से भरी एक क्रम से लगी हुई, सारी किताबें जो मेरे मन को बहुत ही सुकून देती। इस कमरे में जाने मात्र से ही दिन भर का तनाव खत्म हो जाता था। और एक नई ऊर्जा का संचार होता था। उस कमरे के अलावा मुझे कहीं भी किताबें इधर-उधर बिखरी मिलती थी तो मुझे बहुत ही बुरा लगता था। यह कमरा इतना खास था मेरे लिए की घर में कहीं भी सफाई हो या ना हो कहीं भी पोछा लगे या ना लगे पर उस कमरे में सफाई करना प्रतिदिन का नियम था। उस कमरे को सजाना, सवारना साफ करना बहुत ही अच्छा लगता। हऔर जब दिन भर के सारे काम खत्म करके मैं उस कमरे में पढ़ने के लिए बैठती तो मुझे बहुत ही सुकून मिलता। कमरे में बाहर की तरफ जो खिड़की थी उसको खोल कर जब मैं पढ़ने बैठतीं खिड़की से जो ठंडी-ठंडी हवा आती वह बहुत ही आनंदित करती और पढ़ाई करते-करते कब रात के दो तीन बज जाते पता ही ना चलता। जिम्मेदारी होने की वजह से काम भी बहुत सारे करने होते थे। लेकिन मुझे जब भी थोड़ा सा समय मिलता तो मैं दौड़कर बस उसी कमरे में जाती ताकी अपना काम और पढ़ाई पूरी कर सकूंँ। अपना समय उस कमरे में बिताती उन किताबों के साथ। 
जिसकी वजह से कभी-कभी बहुत ही डांँट पड़ती थी। अम्मा बस यही कहती पता नहीं उस कमरे में क्या करती है रात को भी देर तक जागती है पढ़ना ही है तो नीचे पढ़ सकती हो बार-बार उस कमरे में इतनी दूर दौड़कर क्यों जाती हो? पर जो सुकून उस कमरे में मिलता वह और कहीं नहीं जो शांति वहांँ थी वह और कहीं नहीं जहां मुझे दिन भर की थकान भी महसूस ना होती।
गांँव में भी हर किसी को पता था उस कमरे के बारे में क्योंकि गांँव में अपने घर की बातें पता हो ना हो पर पड़ोसी के घर के सारी बातें सबको पता होती ही है।खिड़की खुली रहती तो बिना किसी को बताए ही सबको पता चल जाता कि मैं इस कमरे में हूंँ और पढ़ाई कर रही हूंँ। मैं किसी को कहीं ना मिलू तो सब समझ जाते थे उस कमरे में जरूर मिलूँगी। सामने वाले घर में मेरी सहेली रहती थी। उसके मम्मी-पापा जब भी मुझे उस कमरे में देखते कि मैं पढ़ रही हूंँ तो उसे बहुत ही डांँट पड़ती कि उससे कुछ सीखो दिन भर सारा काम करती है और रात को देर तक पढ़ती है। गर्मी के मौसम में जब रात को किसी की नींद खुलती तो वह लैंप की रोशनी देखकर जान जाता कि मैं अभी तक पढ़ रही हूंँ। कभी-कभी सामने वाली चाची बोलती बस भी करो। और कभी-कभी मेरी सहेली बोलती सोती नहीं हो क्या? उस समय तो लाइट का हफ्तों में आना होता था। इनवर्टर नहीं हुआ करते थे। इमरजेंसी और लैंप की रोशनी से ही काम चलता था। और जब इमरजेंसी डिस्चार्ज हो जाती तो लैंप मेरा साथी था। हर घर की लाइट बंद हो जाती थी। सिर्फ मेरे लैंप या इमरजेंसी की रोशनी देखकर कीड़े भी वहीं पर भाग कर आते जो मुझे बहुत ही ज्यादा परेशान करते ऊपर फुदकते। और जब इन कीड़ों की संख्या काफी ज्यादा हो जाती तो मैं लैंप या इमरजेंसी लेकर छत पर बाहर की तरफ भागती की इतने सारे कीड़े कहीं मेरे कमरे को गंदा ना कर दे। गांव में सब के घर की छत जुड़ी होने की वजह से कहांँ क्या हो रहा है सब दिखाई देता। रात को जिसकी भी नींद खुलती वही कहता कि वह अभी तक पढ़ रही है और मेरे बच्चे सब सो रहे हैं। जिसकी वजह से सभी बच्चों को डांँट पड़ती कि तुम लोग पढ़ते ही नहीं। बहुत ही खूबसूरत सजाया था वह कमरा जिसे हर कोई देखने भी आता था। क्योंकि गांव भर में सिर्फ मैंने ही अपने घर में इकलौता पढ़ाई का कमरा तैयार किया था। उस कमरे में रखी अलमारी फूलदान कमरे की सजावट मेरे द्वारा की गई चित्रकारी देखकर सभी उस कमरे को देखते ही रह जाते। मेरी सहेलियांँ बोलती मैं भी ऐसा ही कमरा तैयार करूंँगी अपने घर में। मैं भी कहती बिल्कुल यह कमरा तो होना ही चाहिए जहांँ हम शांति से पढ़ सकें और कुछ सीख सकें। स्टडीरूम में सारी चीजे व्यवस्थित देखना मेरी आदत थी। पर लड़के किसी सामान को उसी जगह पर वापस रख दे ऐसा तो हो ही नही सकता। मेरे भाई जब उस कमरे में जाते और एक भी किताब इधर-उधर करते तो उन्हे मेरे गुस्से का सामना करना पड़ता था। मैंने उन्हें इतनी रियायत दे रखी थी कि भाई तुम किताब लेकर कहीं भी पढ़ लो मैं वापस लाकर रख लूंँगी पर यहांँ पर मत आना। आज भी जब कभी मायके जाती हूंँ तो उस कमरे में थोड़ी देर के लिए जरूर जाती हूंँ। जो मुझे बहुत ही सुकून देता है। जहांँ मेरी सारी पुरानी यादें ताजा हो जाती है।😊

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